7 शिव मंदिर केदारनाथ से रामेश्वरम् तक जो सब एक ही कतार में हैं Uttarakhand के Kedarnath और दक्षिण भारत के Rameswaram ज्योतिर्लिंगों में एक अनूठा संबंध है। दोनों ही ज्योतिर्लिंग देशांतर रेखा यानी लॉन्गिट्यूड पर 79 डिग्री पर मौजूद हैं। इन दो ज्योतिर्लिंगों के बीच पांच ऐसे Shiv Mandir भी हैं जो सृष्टि के पंच तत्व यानी जल, वायु, अग्नि, आकाश और धरती का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    7 शिव मंदिर केदारनाथ से रामेश्वरम् तक जो सब एक ही कतार में हैं  ये सारे शिवलिंग सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। Guide In Hindi
    7 शिव मंदिर केदारनाथ से रामेश्वरम् तक जो सब एक ही कतार में हैं  ये सारे शिवलिंग सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। Guide In Hindi

    Tamil Nadu के अरुणाचलेश्वर (Arunachaleshwar), थिल्लई नटराज (Thillai Natraj), जम्बुकेश्वर (Jambukeshwar), एकाम्बेश्वरनाथ (Ekambeshwarnath) Mandir और आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती (Srikalahasti) Shiv Mandir के बारे में मान्यता है कि ये सृष्टि के पंच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये सभी देशांतर रेखा पर 79 डिग्री पर स्थापित हैं, जो उत्तर से दक्षिण तक भारत को दो हिस्सों में बांटती है। इस रेखा के एक छोर पर उत्तर में Kedarnath और दक्षिण में Rameswaram ज्योतिर्लिंग है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थापित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को भी इसी कतार में गिना जाता है, लेकिन वास्तव में महाकालेश्वर Mandir 79 डिग्री पर नहीं, बल्कि 75.768 डिग्री पर स्थापित है। इस कारण यह इस कतार से थोड़ा बाहर है।

    ये महज संयोग नहीं है कि ये 7 Shiv Mandir एक साथ एक ही कतार में आते हैं। दो ज्योतिर्लिंगों के बीच ये पांच शिवलिंग सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। ये सारे Shiv Mandir 1500 से 2000 साल पहले अलग-अलग काल खंड में स्थापित किए गए, लेकिन इनके बीच से पंचतत्वों और देशांतर रेखा का संबंध योजनाबद्ध ही माना गया है। 

    उज्जैन के महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय में ज्योतिष विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उपेंद्र भार्गव के मुताबिक, यह बिलकुल ठीक है कि ये Mandir लॉन्गिट्यूड के हिसाब से एक कतार में हैं, लेकिन इनकी स्थापना का काल अलग-अलग है। इस कारण यह कहना कठिन है कि किसी विशेष विचार के साथ इनकी स्थापना की गई होगी। लेकिन, जब भी इन Mandiro की स्थापना की गई, उसमें अक्षांश और देशांतर का पूरा ध्यान रखा गया। वास्तु सिद्धांतों के हिसाब से इनकी स्थापना की गई है।

    Rameswaram रामायण और Kedarnath महाभारतकालीन

    पौराणिक संदर्भों के मुताबिक, Rameswaram ज्योतिर्लिंग की स्थापना त्रेतायुग में भगवान राम ने समुद्र पार करने के पहले की थी। वहीं, Kedarnath की स्थापना महाभारतकाल की मानी जाती है, जब कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडवों ने भगवान Shiv को प्रसन्न करने के लिए उत्तर पथ के हिमालयों पर भगवान Shiv की उपासना की थी। इसी तरह ये 5 Mandir भी 5वीं से 12वीं शताब्दी के बीच बनाए गए हैं।

    क्रम मंदिर राज्य तत्व स्थापना लॉन्गीट्यूड
    1 श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड ---- 79.0669°
    श्रीकालहस्ती मंदिर चित्तूर, आंध्रप्रदेश  वायु  5वीं शताब्दी 79.7037°
    श्री एकाम्बेश्वरनाथ मंदिर कांची, तमिलनाडु पृथ्वी 7वीं शताब्दी 79.7036 °
    4 श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु अग्नि 7वीं शताब्दी 79.0747°
    5 श्री जम्बूकेश्वर मंदिर  थिरुवनाईकवल, तमिलनाडु जल  4थी शताब्दी 78.7108°
    6 श्री थिल्लई नटराज मंदिर चिदंबरम्, तमिलनाडु आकाश 10वीं शताब्दी 79.6954°
    7 श्री रामेश्वरम् मंदिर रामलिंगम्, तमिलनाडु  -------- 79.3129°



    1. केदारनाथ (Kedarnath) Mandir :

    Uttarakhand के रुद्रप्रयाग जिले की सुन्दर घाटियों में, चारों ओर से Himalaya के पहरे के बीच स्थित है Kedarnath Mandir। यह Mandir Nepal में स्थित पशुपतिनाथ के साथ पूर्ण माना जाता है, इसलिए इसे अर्धज्योतिर्लिंग कहा जाता है। यहां पर स्थित शिवलिंग (Shivling)स्वयंभू है और अत्यंत प्राचीन है। इस जगह पर ज्योतिर्लिंग पांडवों द्वारा स्थापित बताई जाती है तथा आदि शंकराचार्य जी ने इसकी पुनर्स्थापना कराई थी।​

    2. श्रीकालहस्ती (Srikalahasti) Mandir : 

    यह आंध्र प्रदेश के चित्तूर में है। तिरुपति से 36 किमी दूर स्थित श्रीकालहस्ती (Srikalahasti) Mandir को पंचतत्वों में वायु का प्रतिनिधि माना जाता है। इसे राहु-केतु क्षेत्र और दक्षिण कैलाशम् नाम से भी जाना जाता है। 5वीं शताब्दी में स्थापित यह Mandir विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख Mandiro में से एक है। इस Mandir में राहु काल और राहु-केतु से जुड़े अन्य दोषों की पूजा कराने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। दुनियाभर में राहु काल की शांति इसी Mandir में होती है। 

    3. एकाम्बेश्वरनाथ (Ekambeshwarnath) Mandir : 

    Tamil Nadu के कांचीपुरम् स्थित एकाम्बेश्वरनाथ (Ekambeshwarnath) Mandir के बारे में किंवदंती है कि यहां देवी पार्वती ने क्रोधित Shiv को प्रसन्न करने के लिए बालूरेत से शिवलिंग की स्थापना कर तप किया था। इस शिवलिंग को पंचतत्वों में पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधि माना जाता है। करीब 25 एकड़ क्षेत्र में बना यह Mandir 11 मंजिला है। इसकी ऊंचाई लगभग 200 फीट है। 7वीं शताब्दी में इस Mandir की स्थापना की गई थी। वर्तमान Mandir चोल राजाओं द्वारा 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। 

    4. अरुणाचलेश्वर (Arunachaleshwar) Mandir : 

    इसे अन्नामलाईयार Mandir भी कहते हैं। यह Tamil Nadu के तिरुवनमलाई शहर में अरुणाचला पहाड़ी पर है। यहां स्थापित Shiv लिंग को अग्नितत्व का प्रतीक माना जाता है। 7वीं शताब्दी में स्थापित इस Mandir का चोल राजाओं ने 9वीं शताब्दी में विस्तार किया था। 10 हेक्टेयर में बने इस Mandir के शिखर की ऊंचाई 217 फीट है। यहां हर साल नवंबर-दिसंबर में दीपम् उत्सव मनाया जाता है, जो 10 दिन तक चलता है। इस दौरान Mandir के आसपास बड़ी मात्रा में दीपक जलाए जाते हैं। एक विशाल दीपक Mandir की पहाड़ी पर जलाया जाता है जो दो-तीन किमी की दूरी से भी आसानी से देखा जा सकता है।  

    5. जम्बुकेश्वर (Jambukeshwar) Mandir : 

    जम्बुकेश्वर (Jambukeshwar) या जम्बूकेश्वरार Mandir, थिरुवनाईकवल (त्रिची) जिले में है। ये पंचतत्वों में जल का प्रतिनिधि शिवलिंग माना गया है क्योंकि इस Mandir के गर्भगृह में एक प्राकृतिक जलधारा निरंतर बहती रहती है। Mandir करीब 1800 साल पुराना माना जाता है। कुछ पौराणिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। 

    6. थिल्लई नटराज (Thillai Natraj) Mandir : 

    भगवान Shiv के ही रूप नटराज का Mandir Tamil Nadu के चिदंबरम् शहर में है। पहले इस जगह को थिलाई के नाम से भी जाना जाता था, इसलिए इस Mandir को थिल्लई नटराज (Thillai Natraj) Mandir भी कहा जाता है। भरतमुनि द्वारा बताए गए नाट्यशास्त्र के सभी 108 रूप इस Mandir में देखने को मिलते हैं। Mandir की दीवारों पर भरतनाट्यम् की विभिन्न मुद्राएं उकेरी गई हैं। वर्तमान Mandir 10वीं शताब्दी में चोल राजाओं ने बनवाया था।

    7. श्री रामेश्वरम् Mandir :

    दक्षिण भारत की सुनहरी धरती पर समुद्र तट पर बसा एक खूबसूरत द्वीप है Rameswaram। यह वही Rameswaram है जिसका वर्णन रामायण में मिलता है, इसके शिवलिंग की स्थापना श्री राम ने की थी तथा इसके Mandir का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण इसकी मान्यता अत्यधिक है। ​